ध्यान रखें, अपने जीवन के हर निर्माण कार्य में हम अकेले नहीं हैं, अनेक लोग शामिल होंगे इसमें। हमारे विकास, प्रगति और सुरक्षा में बहुतों का सहयोग है। दूसरों के सहयोग को अपने जीवन में इस प्रकार अंकित करें, जैसे पत्थर पर इबारत खोदी गई हो, जो अमिट रहती है। दूसरी तरफ, औरों से मिले असहयोग, अपमान, र्दुव्यवहार को ऐसे जीवन में रखें, जैसे पानी पर लकीर खींची गई हो। जीवन के कार्य सहयोग से आरंभ हों और आभार पर अंत हों।
जैसे छड़ी या डंडे के दो उपयोग हैं- यदि प्रहार करें तो शस्त्र है और यदि सहारा लें तो उपयोग ही बदल जाएगा। छड़ी अपने दो सिरों के कारण ही छड़ी है। एक छोर पर हम हैं, दूसरे पर अन्य लोग। आभार रखेंगे तो छड़ी सेतु बन जाएगी, वरना लोग कृतज्ञता को भी हथियार की तरह इस्तेमाल कर ही लेते हैं।
आईये एक कहानी से शुरू करते है....
दो फकीर एक दिन अपने झोपड़े में वापस लौटे , वर्षा के दिन आने को थे। आकाश में बादल घिर गए थे। तूफ़ान आ रहे थे हवाएं जोर से बह रही थी। और बारिश के होने की संम्भावना निश्चित थी। वे दोनों साँझ को झोपड़े पर लौटे। गांव के बाहर, नदी के पास उनका झोपड़ा था। एक फ़कीर ने जैसे ही अपने झोपड़े को देखा हैरान रह गया। तूफान ने आधे झोपड़े को उड़ा दिया था। झोपड़े का आधा हिस्सा टूटा हुआ, गिरा हुआ दूर पड़ा था।
वह बहुत उदास हो गया। वह कहने लगा इन्ही बातों से परमात्मा पर शक आजाता है। इतना बड़ा गांव है। इतने बड़े मकान है। उनमें तो किसी का मकान नहीं टूटा है। और इस गरीब फकीर के झोपड़े को भगवान ने तोड़ दिया। इसी से शक होता है परमात्मा है भी या नहीं।
वो ये सोच ही रहा था कि इतने में दूसरा फ़कीर वहाँ आ गया।
दूसरे फ़कीर के आते ही, पहले फकीर ने कहा- देखते हो हमारे उपवास और पूजा का फल मिला है, की आंधियों ने हमारा झोपड़ा तोड़ दिया। और बारिश सर पर खड़ी है। अब वर्षा में क्या होगा?????
दूसरे फ़कीर झोपड़े को देख कर आनंद से भर गया और नाचने लगा। और उसने एक गीत गया.....परमात्मा तेरा धन्यवाद है! तेरी रजा पूरी हो। तेरी मर्जी तू ही जाने। आंधियों और तूफानों का क्या भरोसा, तूफ़ान क्या देखते है, गरीब का झोपड़ा है।
पूरा ही उड़ा देती!!!!!जरूर आपने ही रोका होगा। कोई बाधा दी होगी। तभी आधा झोपड़ा बच गया। और आधा तो काफी है। वो झोपड़े के भीतर गया और उसने
एक गीत लिखा , और गीत में उसने लिखा... मुझे तो पता ही नहीं आधे छप्पर में इतना आनंद हो सकता है,,, नहीं तो,,, हम खुद ही आधा अलग कर देते ।
आज रात को सोये,,,आधे में सोए भी रहे, और जब भी आँख खुली तो आकाश में चमकते तारे और चाँद को भी देखते रहे। वर्षा आगई।
फकीर ने कहा आधे में सोते रहेंगे,,,आधे में वर्षा का गीत हो जायेगा। वर्षा की बूंदे भी टपकती रहेंगी। हमें पता होता काश! तो हम पहले ही छप्पर अलग कर देते। भगवान आपने वक़्त पर ठीक किया। उस रात वो दोनों झोपड़े में सोए।
पहला फ़कीर बहुत दुखी सोया बहुत परेशान सोया रात नींद नहीं आई। क्योंकि शिकायत उसके मन में आ गई थी। दूसरा फ़कीर बहुत गहरी नींद में सोया उसके मन में परमात्मा के लिए धन्यवाद था कृतज्ञता थी। वह सुबह आनंदित उठा।
घटना एक ही थी देखने वाले दो थे। परिस्तिथि एक ही थी देखने की दृष्टि दो थी।
अब कौन सी दृष्टि अपकी है ये आपको तय करना है। अगर पहले वाले फ़कीर की दृष्टि है तो मन अशांत होगा। अगर दूसरे वाले फ़कीर की दृष्टि है तो जीवन में अद्भुत आनंद और उत्सव रहेगा।
इस संबंध में आपसे इतना ही कहना चाहती हूँ ........
अगर पहले वाले फ़कीर की दृष्टि हो तो इस जीवन में आपको दुःख के सिवाए कुछ नहीं मिलेगा। और उसका दोष जीवन को मत देना की जीवन बुरा है।
स्मरण रखना उसकी सारी की सारी बात जीवन के बुरे होने की नहीं है वो दृष्टि के बुरे होने की है। और अगर दृष्टि दूसरे फ़कीर की है तो इस जीवन में बहुत है।
इस जीवन के पत्ते पत्ते में संगीत है लेकिन दृष्टि हो तो ही वो दिखाई पड़ना शुरू होता है। अगर ये दिखाई पड़ जाये की देखने का ढंग गलत है और अपने हाथ से अशांति के बीज बो रहा हूँ तो जीवन के जीने का ढंग बदल देना। जहाँ फूल भी है काटे भी वहाँ सिर्फ काँटों को देखना दुख का कारण है। अगर ये समझ आजाये की दुखी होना मेरी दृष्टि में है तो उस दृष्टि को सकारात्मक करना कठिन नहीं है। सब तुम्हारी दृष्टि पर निर्भर है। क्योंकि जीवन वही हो जाता है जो तुम्हारे देखने की दृष्टि होती है।




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