हर व्यक्ति के जीवन में खुशी, उत्साह और उमंग का होना बहुत जरूरी हैं,
इनकी वजह से ही हमें सफलता मिलती हैं।
इसलिए हमें अपने जीवन में उत्साह बनाये रखना चाहिए।
कभी भी निराश नही होना चाहिए।
चलिये एक कहानी से हम शुरू करते है.....
विराट नगर के राजा सुकीर्ति के पास लौहशांग नामक एक हाथी था।
राजा ने कई युद्धों में इस पर आरूढ़ होकर विजय प्राप्त की थी।
धीरे-धीरे लौहशांग भी वृद्ध होने लगा और युवावस्था वाला पराक्रम जाता रहा।
जब हाथी वृद्ध होने लगा तो राजा ने उसे युद्ध में ले जाना बंद कर दिया।
हाथी की देखभाल में कोई कमी नहीं आई, लेकिन वह युद्ध में न जाने की वजह से उदास रहने लगा था।
एक दिन हाथी राजा के सरोवर में पानी पीने गया, तो वह तालाब की दलदल में फंस गया।
बहुत कोशिश करने के बाद भी वह दलदल से बाहर नहीं निकल पा रहा था।
हाथी जोर-जोर से चिल्लाने लगा। जब राजा के सेवकों ने हाथी की आवाज सुनी तो वे
तुरंत ही उसके पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि हाथी दलदल में फंस गया है
और वह निकल नहीं पा रहा है।
इस बात की सूचना मिलते ही राजा तुरंत तालाब के पास पहुंच गया।
सैनिकों ने बहुत कोशिशें की, लेकिन वे हाथी को बाहर नहीं निकाल पा रहे थे।
राजा बहुत उदास होगया राजा सोचने लगा जिस हाथी ने मुझे सबसे ज्यादा युद्ध जिताये
आज वो हाथी दलदल में फसकर मर जायेगा।
हाथी को निकलवाने के कई प्रयास किए गए पर फायदा नहीं हुआ।
जब सारे प्रयास असफल हो गए, तब एक चतुर मंत्री ने युक्ति सुझाई।
सैनिकों को जिरह बख्तर पहनाए गए घोड़े तैयार किये गए।
सबको हाथी के सामने खड़ा कर दिया गया।
हाथी के सामने युद्ध नगाड़े बजने लगे और सैनिक इस प्रकार कूच करने लगे जैसे वे शत्रु पक्ष की
ओर से लौहशांग की ओर बढ़ रहे हैं।
लौहशांग को लगने लगा की उसका राजा किसी मुसीबत में है।
मदद करने के लिए उसने जोर की चिंघाड़ लगाई और
शत्रु सैनिकों पर आक्रमण करने के लिए दलदल से निकलकर उन्हें मारने दौड़ पड़ा।
बाद में बड़ी मुश्किल से उसे नियंत्रित किया गया।
युद्ध का माहौल देखकर लौहशांग को अपने पुरानी ताकत और इच्छाशक्ति का अहेसास हुआ।
उसके मन और हृदय में उत्साह का संचार हुआ।
जो युद्ध में न जाने से खत्म हो चूका था
और अंत में उसकी इच्छाशक्ति और उत्साह से खुद ही दलदल से बाहर आ गया ।
यह देख कर राजा हैरान रह गया तब मंत्री ने राजा को बताया
महाराज आप हमेशा इस हाथी को युद्ध में साथ ले जाते थे।
लेकिन जब आपने इसे युद्ध पर ले जाना बंद कर दिया तो
इसके जीवन का उत्साह भी नष्ट होगया।
दलदल में फसने के बाद यह अपनी हिम्मत हार गया।
लेकिन जब इसने ढोल नगाड़े की आवाज सुनी तो इसे लगा की आप फिर से इसे युद्ध में ले जायेंगे।
यह सोच कर इसका उत्साह लौट आया। और यह दलदल से बाहर निकल गया।
इस कहानी से शिक्षा मिलती है कि यदि हमारे मन में एक बार उत्साह-उमंग जाग जाए तो फिर
हमें कार्य करने की ऊर्जा स्वतः ही मिलने लगती है और कार्य के प्रति उत्साह का
मनुष्य की उम्र से कोई संबंध नहीं रह जाता।
संसार में मनोबल ही प्रथम है। वह जाग उठे तो असहाय और विवश
प्राणी भी असंभव होने वाले काम कर दिखाते हैं।
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