मान लीजिये की आप चाय का एक कप हाथ में लिए खड़े है और कोई आपको धक्का दे देता है तो क्या होता है???? आपके कप से चाय छलक जाती है। अगर आपसे पुछा जाए की आपके कप से चाय क्यों छलकी?? तो आपका उत्तर होगा "क्योंकि अमूक (फलां) ने मुझे धक्का दिया"। मगर यह गलत उत्तर होगा। कप में चाय थी इसलिए छलकी। आपके कप से वही छलकेगा, जो उसमें है। लगते है लोगो के व्यवहार से तो उस समय हमारी वास्तविकता ही छलकती है। आपका सच तब तक सामने नहीं आता जब तक आपको धक्का न लगे। देखना ये है कि जब आपको किसी ने धक्का दिया तो क्या छलका ??? निश्चिंतता, मानौता, गरिमा। ईर्ष्या, द्वेष, घृणा इत्यादि। यूनान में एक बहुत बड़ा मूर्तिकार हुआ। उसकी बड़ी दूर दूर तक ख्याति थी। दूर देशों में उसका नाम और उसकी कीर्ति पहुँच गई थी। उसकी मूर्तियाँ विश्व के सभी बाजारों में बिकी थी। और शायद ही कोई राजमहल हो जहाँ उसकी मूर्तियाँ न पहुँची हो। बड़ी उसकी ख्याति थी, बड़ा उसका यश था। यश और ख्याति में वह भूल ही गया था, कि एक दिन मौत आती है और सब नष्ट हो जाता है। एक दिन मौत आ गई। बड़ा कलाकार था। बड़ा मूर्तिकार था। आते हुए बुढ़ापे और मृत्यु को देख कर उसने सोचा,,, मैं बचने का कोई उपाय करूं। मौत से किस भाँति बचूं ??? एक सीधी सी बात जो उसे सूझ गई। जो यह थी की उसने अपनी ही ग्यारह मूर्तियाँ बना ली। और जिस दिन मौत उसके द्वार पर आयी। वह उन ग्यारह मूर्तियों में छिप कर खड़ा होगया। उसकी कुशलता इतनी अद्भुत थी की यह तय करना इतना मुश्किल था की कौन मूर्ति है और कौन मूल! असली आदमी कौन है उन बारह मूर्तियों में खोजना कठिन था। मौत भीतर आयी। मौत घबड़ा गई...। जिसको लेने आयी थी वैसे बारह लोग वहाँ मौजूद थे। क्योंकि वह मूर्तिकार भी साँस बंद करके मूर्तियों के बीच, मूर्ती बनकर खड़ा होगया था। पहचानना कठिन था,कौन असली है। एक को ले जाना था, बारह को तो ले जाया नहीं जा सकता था। भूल करना उचित न था। मौत वापस लौट गई। और उसने जा कर परमात्मा से पुछा वहाँ तो बारह लोग एक जैसे मौजूद हैं। मैं किसको लाऊं??? और जो असली है उसका पता कैसे लगे??? परमात्मा ने मौत के कान में कुछ कहा :- जाकर इस सूत्र को बोल देना, जो असली है वह बाहर निकल आएगा। मौत वापस लौटी। उस मूर्तिकार के भवन में मूर्तिकार छिपा था, अपनी मूर्तियों में। मौत भीतर गई। उसने एक एक मूर्ति को गौर से देखा और अचानक वह बोली :- और सब तो ठीक है, थोड़ी सी भूल रह गई। और जैसे ही उसने कहा:- और सब तो ठीक है थोड़ी सी भूल रह गई, वह मूर्तिकार बोला, कौन सी भूल??? उस मृत्यु ने कहा :- तुम अपने को नहीं भूल सकते हो। और नही भूल सकते हो की तुमने इन मूर्तियों को बनाया है। बाहर आ जाओ तुम पकड़ लिये गए हो। मौत ने तुम्हे चुन लिया है। उस चित्रकार ने लेकिन वह इस बात को नहीं भूल सकता था कि "मैंने बनाई है"। मौत ने जब उसके द्वारा बनाये हुए मूर्ति में रह गई भूल को बताया तो उसके अहंकार को धक्का लगा। उसके भीतर से अहंकार और क्रोध छलका। मौत वापस लौट गई थी, और मूर्तिकार जीत गया था। परन्तु जब दुबारा मौत मूर्तिकार के भवन में आई और उसने मूर्तिकार द्वारा बनाई हुई मूर्ति में भूल बताया, तो मूर्तिकार के अहंकार को धक्का लगा। क्योंकि वह प्रसिद्ध मूर्तिकार था। बहुत ही कुशल था। इसलिए उससे भूल नहीं हो सकती थी, और वह बोल पड़ा...कैसी भूल, और इस बार मौत जीत गई। अहंकार में वह भूल ही गया कि उसे चुप रहना है। कहते है न अहंकार एक ऐसी दौड़ है, जहाँ जीतने वाला हार जाता है। इसलिए जब हम किसी काम में कुशल होते है या सफल होते है , तो कभी अहंकार नही करना चाहिए । क्योंकि अहंकार में हम जीत कर भी हार जाते है। यदि हम सरल है,,, सहज है,,, तो हमें सदैव सफलता मिलती रहेगी। |
रविवार, 22 अगस्त 2021
अहंकार में इंसान को हकीकत दिखाई नहीं देता। कितना भी जोर से बोला जाये, सच सुनाई नहीं देता।
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