जीवन को जियो। जीवन एक अवसर है। उसे चूको मत। उसके उतार चढ़ाव देखो। उसकी अँधेरी घाटियों में भी उतरो और प्रकाशोज्वल शिखरों पर भी चढ़ो। काँटे भी चुभेंगे, फूल भी हाथ लगेंगे। इन दोनों परिस्तिथियों को जियो। क्योंकि इसी चुनौती में से गुजर कर इसी आग मे से गुजर कर आपकी सफलता आपको मिलेगी।
एक प्रचीन कथा है शायद आपने यह सुनी हो।यह कहानी ऐसे ढंग से कही गयी है कि बच्चे पढ़े तो उन्हें मनोरंजन लगेगा। ज्ञानी पढ़े तो जीवन जीने का नया ढंग मिल जाये।
आपने बैताल पचीसी का नाम सुना होगा। भारत देश में ऐसी कई किताबें लिखी गई जिन्हें बहुत तलों पर पढ़ा जा सकता है। जिनमें परत दर परत अलग अलग अर्थ है। जिनमें एक दो तीन चार पांच इससे ज्यादा भी अर्थ दौड़ते रहते है। जैसे एक साथ पांच रास्ते चल रहे हो पैरेलल (समानांतर) तो जैसी जिसकी सुविधा हो, पढ़कर अर्थ निकाल सकता है।
बैताल पचीसी की पहली कथा है। वैसे तो पच्चीसों कथाएँ बड़ी अद्भुत है। लेकिन बैताल पचीसी की पहली कथा लिखती हूँ। जो हमें जीवन जीने का एक अद्भुत तरीका सिखाती है।
पहली कथा है, एक बार सम्राट विक्रमादित्य के दरबार में एक फकीर आया, सुबह का वक़्त था। रिवाज के अनुसार लोग सम्राट को भेट चढ़ाने सुबह सुबह आते थे। उस फकीर ने भी जंगली सा दिखाई पड़ने वाला फल सम्राट को भेंट किया। सम्राट थोड़ा मुस्कुराये भी और सोचा इस फल को भेट करने के लिए इतने दूर आने की जरुरत भी क्या थी। सम्राट ने सोचा फकीर है, फकीर के पास और कुछ होभी नहीं सकता, तो उसने फकीर के भेट को स्वीकार कर लिया। जो भी भेट आती,सम्राट बगल में बैठे वजीर को देता जाता था।
यह क्रम दस वर्षों तक चला।
वो फकीर रोज सुबह आता और रोज उसी तरह का एक जंगली फल ले आता। दस वर्ष गुजर गए सम्राट रोज वजीर को फल दे देता। न तो सम्राट ने कभी फकीर से पुछा क्योंकि रोज सुबह सैकड़ो भेट देने वाले लोग थे। फुर्सत भी न थी समय भी न था। और इस फकीर से पूछने जैसा भी कुछ नहीं लगा। पर एक दिन पास ही सम्राट का पाला हुआ बंदर भी बैठा था इसबार सम्राट ने वजीर को फल न दे कर बंदर को फल दे दिया, बंदर ने फल खाया और उसके मुँह से एक बहुत बड़ा हीरा, जो फल में छिपा था नीचे गिर गया। सम्राट तो चौका इतना बड़ा हीरा तो उसने देखा भी न था। वजीर से कहा बाकि फल कहा है???? वजीर ने सोचा था जंगली फल है पर उसे यह भी मालूम था कि सम्राटों के पास संभल कर रहना पड़ता है तो एक तलघरे में वह सभी फल फेकता जाता था, सोचता था की इन फलों का करेंगे क्या जंगली थे खाने योग्य भी नहीं थे। तलघरा खोला गया बदबू से भरा हुआ था। क्योंकि सारे फल सड़ गए थे। लेकिन उन सड़े हुए फलों के बीच हीरे चमक रहे थे।
ऐसे हीरे सम्राट ने देखे नहीं थे। सम्राट ने फकीर से पुछा ये क्या राज है???? तुम क्या चाहते हो किस लिये तुम दस साल से ये भेट ला रहे हो??? और मैं कैसा अज्ञानी कभी देखा भी नहीं, मैंने समझा की जंगली फल है।
इस पर फ़कीर ने बड़ी अनमोल बात कही, फकीर ने कहा "होश न हो तो ऐसे ही ज़िन्दगी चूक जाती है"और दूसरी समानांतर अर्थ की धारा शुरू होती है। उस फकीर ने कहा रोज ही ज़िन्दगी नयी किरण लाती है लेकिन जंगली फल समझकर लोग फेंकते चले जाते है। और हर फल के भीतर हीरा छिपा है जिसे तुमने ने कभी देखा नहीं।
दोस्तों ज़िन्दगी हमें अनेक मौके देती है। हर पल एक नयी उम्मीद नयी किरण ले कर आती है लेकिन हम भी सम्राट की तरह बिना समझे बिना सोचे अपनी सफलता के मौके को जंगली फल समझ कर कल पर छोड़ देते है। सोचते है कि शायद कल अच्छा हो लेकिन आज को हम खो कर सम्राट की तरह अपने सफलता से और खुशियों से दस साल पीछे हो जाते है। इसलिए आज हँसिये आज के हर मौके का प्रयोग करके ज़िन्दगी को कामयाब बनाइये।




5 टिप्पणियां:
Greattttt *´ㅅ`)゙
This is truly above and beyond
G
Wonderful
Very motivational Story
Great post
Very nice👍
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